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Magarmach Se Bair: मोंटी बंदर और जग्गू मगरमच्छ | Jungle Story

पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करना समझदारी नहीं, लेकिन अगर मगरमच्छ ही धोखा दे तो? पढ़िए 'मगरमच्छ से बैर' की यह रोमांचक कहानी जहाँ मोंटी बंदर ने अपनी जान कैसे बचाई।

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Magarmach Se Bair: दोस्ती विश्वास पर टिकी होती है, लेकिन जब विश्वास में स्वार्थ मिल जाए, तो वह जानलेवा बन सकती है। आपने वह कहावत तो सुनी होगी—"जल में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए" (One should not make enemies with the crocodile while living in water). लेकिन क्या हो जब मगरमच्छ खुद दोस्ती का नाटक करके धोखा दे? यह कहानी 'सुंदरवन' की 'नीली झील' के पास रहने वाले मोंटी बंदर और जग्गू मगरमच्छ की है। यह कहानी हमें सिखाती है कि मुसीबत के समय घबराने के बजाय Logic (तर्क) का इस्तेमाल कैसे करें।

कहानी: मीठे जामुन और कड़वा सच

मोंटी और जग्गू की अनोखी दोस्ती

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सुंदरवन के बीचों-बीच एक बहुत बड़ी और गहरी झील थी—नीली झील। झील के किनारे जामुन का एक विशाल पेड़ था, जिस पर मोंटी नाम का बंदर रहता था। मोंटी बहुत खुशमिज़ाज था। वह दिन भर पेड़ पर उछल-कूद करता और मीठे-मीठे रसीले जामुन खाता।

झील में जग्गू नाम का एक मगरमच्छ रहता था। जग्गू स्वभाव से थोड़ा आलसी और पेटू था। एक दिन वह पेड़ के नीचे धूप सेंक रहा था। मोंटी ने ऊपर से देखा और दया करके कुछ पके हुए जामुन नीचे फेंक दिए। "अरे भाई! ये लो, थोड़े जामुन चखो," मोंटी ने आवाज़ लगाई।

जग्गू ने जामुन खाए तो वह खुश हो गया। इतने मीठे जामुन उसने आज तक नहीं खाए थे। उस दिन से दोनों में दोस्ती हो गई। मोंटी रोज़ जग्गू को जामुन खिलाता और जग्गू उसे झील की कहानियां सुनाता।

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लालच की एंट्री

एक दिन जग्गू कुछ जामुन अपनी पत्नी कलि के लिए घर ले गया। कलि मगरमच्छ बहुत चालाक और लालची थी। जामुन खाते ही उसने जग्गू से कहा, "सुनो जी, ये जामुन तो शहद से भी मीठे हैं। सोचो, जो बंदर रोज़ इतने मीठे फल खाता होगा, उसका कलेजा (Heart) कितना मीठा होगा?"

जग्गू घबरा गया। "अरे भागवान! मोंटी मेरा दोस्त है। मैं उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता।" लेकिन कलि ने ज़िद पकड़ ली। "अगर तुम मेरे लिए उस बंदर का कलेजा नहीं लाए, तो मैं खाना-पीना छोड़ दूंगी और इसी झील में डूबकर जान दे दूंगी!"

जग्गू, जो अपनी पत्नी से डरता था (और थोड़ा खुद भी लालची था), हार मान गया। उसने एक दुष्ट योजना बनाई।

मौत का निमंत्रण

अगले दिन जग्गू पेड़ के नीचे पहुंचा और बहुत उदास चेहरा बनाकर बैठा रहा। मोंटी ने पूछा, "क्या हुआ मित्र? आज इतने उदास क्यों हो?"

जग्गू ने झूठ बोला, "क्या बताऊँ मोंटी भाई! मेरी पत्नी ने मुझे बहुत डांटा है। उसने कहा कि तुम रोज़ अपने दोस्त का दिया खाते हो, लेकिन उसे कभी घर नहीं बुलाते। आज उसने तुम्हारे लिए विशेष दावत बनाई है। चलो, मेरी पीठ पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें अपने घर ले चलता हूँ।"

मोंटी बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि उसका दोस्त उसकी कितनी कद्र करता है। बिना कुछ सोचे, मोंटी पेड़ से नीचे उतरा और जग्गू की खुरदरी पीठ पर बैठ गया। जग्गू तेज़ी से झील के बीच की ओर बढ़ने लगा।

बीच मझधार में धोखा

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जैसे ही वे झील के बीचों-बीच पहुंचे, जहाँ पानी बहुत गहरा था और किनारा दूर था, जग्गू की चाल बदल गई। उसने सोचा अब मोंटी भाग नहीं सकता। जग्गू हँसा, "मोंटी, तुम बहुत भोले हो। मेरी पत्नी ने कोई दावत नहीं बनाई है। असल में, तुम ही आज की दावत हो। उसे तुम्हारा मीठा कलेजा खाना है।"

मोंटी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई (हालाँकि वह पानी में था)। चारों तरफ मौत थी। अगर वह पानी में कूदता तो डूब जाता, और अगर पीठ पर रहता तो मगरमच्छ का शिकार बनता। उसे समझ आ गया कि Magarmach Se Bair (दुश्मनी) मोल लेना अब मजबूरी है, लेकिन ताकत से नहीं, दिमाग से।

मोंटी का मास्टरस्ट्रोक (Logic)

मोंटी ने अपनी घबराहट छिपाई और ज़ोर से हँसने लगा। "हा हा हा! अरे जग्गू भाई! तुम भी ना, एकदम बुद्धू निकले।"

जग्गू हैरान रह गया। "तुम हँस क्यों रहे हो? मरने वाले हो!"

मोंटी ने कहा, "अरे यार, अगर तुम्हें मेरा कलेजा ही चाहिए था, तो पहले बताना चाहिए था ना। हम बंदर अपना कलेजा हमेशा अपने साथ थोड़ी रखते हैं। वो तो बहुत भारी और कीमती होता है, इसलिए मैं उसे जामुन के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर संभाल कर रखता हूँ।"

जग्गू, जो अक्ल का थोड़ा कच्चा था, उसकी बातों में आ गया। "क्या? तुम अपना कलेजा पेड़ पर छोड़ आए हो?"

मोंटी ने कहा, "हाँ भाई! देखो, मैं तो तुम्हारे लिए जान भी दे दूँ। लेकिन बिना कलेजे के तुम अपनी पत्नी को क्या खिलाओगे? खाली शरीर ले जाकर तो वो तुम पर और गुस्सा करेगी। चलो वापस चलते हैं, मैं पेड़ से कलेजा उतारकर तुम्हें दे दूंगा।"

लालच और मूर्खता ने जग्गू की सोचने की शक्ति खत्म कर दी थी। उसने सोचा मोंटी सच कह रहा है। उसने तुरंत यू-टर्न (U-Turn) लिया और तेज़ी से किनारे की तरफ तैरा।

सुरक्षित किनारा और सबक

जैसे ही वे किनारे के पास पहुंचे, मोंटी ने एक लंबी छलांग लगाई और सीधे जामुन के पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जा बैठा। उसकी जान में जान आई।

जग्गू पानी में इंतज़ार करता रहा। "चलो मोंटी भाई! जल्दी कलेजा नीचे फेंको, देर हो रही है।"

मोंटी ने ऊपर से एक सड़ा हुआ जामुन जग्गू के मुंह पर मारा और चिल्लाया, "अरे मूर्ख मगरमच्छ! क्या किसी का कलेजा भी शरीर से अलग हो सकता है? तूने दोस्ती में धोखा दिया है। जा भाग जा यहाँ से! आज के बाद कभी यहाँ मत आना।"

जग्गू को अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ। वह शर्मिंदा होकर पानी में डूब गया। उसे न कलेजा मिला, न दोस्ती बची, और घर जाकर पत्नी की डांट मिली वो अलग।

निष्कर्ष: बुद्धि बल से बड़ी है

मोंटी ने साबित कर दिया कि अगर मुसीबत में हिम्मत और बुद्धि का सही इस्तेमाल किया जाए, तो मौत के मुंह से भी वापस आया जा सकता है। उस दिन के बाद मोंटी ने सीखा कि जल में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए, लेकिन अगर मगरमच्छ धोखेबाज़ हो, तो उसे सबक ज़रूर सिखाना चाहिए।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें दो बड़ी सीख मिलती हैं:

  1. मुसीबत में संयम (Presence of Mind): डरने से दिमाग काम करना बंद कर देता है। शांत रहकर ही समस्या का हल निकलता है।

  2. धोखेबाज़ों से दूरी: जो एक बार धोखा दे, उस पर दोबारा भरोसा नहीं करना चाहिए।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: मगरमच्छ - विकिपीडिया 

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